Friday, 25 September 2015

परिवारम प्रियम


बिहार के चुनावी रण में रिश्ते का घालमेल चरम पर है. अपने रसूख के हिसाब से हर नेता अपनी दूसरी पीढ़ी को आगे लाने की होड़ में है. इसमें ना तो लालू पीछे हैं और ना ही मांझी. बीजेपी के भी कई नेता अपने प्रभाव का जादू चलाकर अपने नौनिहालों को टिकट दिलाने में कामयाब हुए हैं. 243 सीटों की बिसात पर सभी पार्टियां अपना-अपना मोहरा सजा रही हैं. पार्टी दूसरे उम्मीदवारों के लिए भले ही मानदंड तय करे लेकिन रिश्तेदारों के लिए बस रिश्ता ही बड़ा और पुख्ता पैमाना है. बिहार चुनाव में महागठबंधन की ओर से 242 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी गई है. हर सीट पर उठापटक, जोड़तोड़ के बावजूद लिस्ट में अपनों के नाम शामिल किए गए.
बेटे के नाम लालू की विरासत- लालू यादव ने अपनी विरासत अपने दोनों बेटों को सौंपने का मन बना लिया है. लालू के दोनों बेटे लालटेन की रौशनी में विधानसभा की देहरी पार करने को तैयार खड़े हैं. बड़े बेटे तेज प्रताप को महुआ से और छोटे बेटे तेजस्वी को राघोपुर से RJD का उम्मीदवार बनाया गया है.
अपनों के मांझी- उधर हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा के मांझी भी चुनावी मैदान में ताल ठोककर खड़े हैं. अपने परिवार के लिए तीन सीटों पर पहले ही कब्जा कर लिया है. दो सीटों पर वे खुद उम्मीदवार हैं और तीसरी सीट अपने बेटे संतोष कुमार सुमन को सौंप दिया है. मांझी मखदुमपुर और इमामगंज से खुद चुनाव लड़ रहे हैं और उनके बेटे संतोष कुटुंबा से उम्मीदवार बनाए गए हैं. HAM के बिहार अध्यक्ष शकुनी चौधरी ने अपने बेटे रोहित कुमार को खगड़िया से टिकट दिलवा दिया है.
बीजेपी में रिश्तेदारों को मलाईचुनावी समर में रिश्तों के रस में बीजेपी भी सराबोर है. बक्सर के सांसद अश्विनी चौबे अपने बेटे अरिजीत को भागलपुर से टिकट दिलवाने में सफल रहे हैं. राज्यसभा सांसद डॉक्टर सीपी ठाकुर ने बेटे विवेक ठाकुर को ब्रह्मपुर से टिकट दिलवा दिया है. बीजेपी नेता गंगा प्रसाद अपने बेटे संजीव चौरसिया को दीघा सीट से विधानसभा भेजने का बंदोबस्त कर लिया है. बिहार में नेता विपक्ष नंद किशोर यादव भी अपने बेटे नितिन किशोर को टिकट दिलाने की कोशिश में हैं. सारण के सांसद जनार्दन सिंह भी बेटे प्रमोद को टिकट दिलवाने की पुरजोर कोशिश में लगे हैं. सासाराम के सांसद छेदी पासवान भी बेटे को बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़वाना चाहते हैं.
पासवान का परिवारवाद एनडीए के साथी रामविलास पासवान ने तो अपने बेटे चिराग पासवान को पार्टी की संसदीय बोर्ड का चेयरमैन बना दिया है. इसके अलावा पासवान ने अपने भाई पशुपतिनाथ पारस को अलौली सीट से एलजेपी का उम्मीदवार बनाया है. पासवान के भतीजे प्रिंस राज को भी सियासी राजकुमार बनाने के लिए चुनाव में उतार दिया है. पासवान की रिश्तेदार सरिता पासवान को सोनबरसा से एलजेपी का उम्मीदवार बनाया गया है. इसके अलावा पासवान की मेहरबानी अपने एक और करीबी विजय पासवान पर भी रही. उन्हें त्रिवेणी गंज से उम्मीदवार बनाया गया है.
दिग्गजों के घर में जारी है घमासान तमाम रिश्तेदारों को टिकट बांटने के बावजूद दिग्गजों के घर में घमासान जारी है. कई जमाई अपने ससुर के सियासी फैसलों से नाराज हैं. पासवान के दामाद अनिल कुमार साधु टिकट ना मिलने से खासे नाराज हैं. साधु ने तो ससुर पासवान के खिलाफ सियासी जंग छेड़ने का फैसला कर लिया है. उधर जीतनराम मांझी के दामाद भी उनके फैसले से नाराज हैं. मांझी के दामाद देंवेंद्र को बोधगया से टिकट मिलने की उम्मीद थी. लेकिन ऐसा हो ना सका. अब मांझी के जमाई बाबू ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरने का फैसला कर लिया है.
                                                                          
कुल मिलाकर बिहार के चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा दिग्गजों के अपने लोग हैं. अगर रिश्तेदारों को जनता ने कबूल कर लिया तो समझो नेताओं का काम हो गया लेकिन खारिज कर दिया तो इनकी साख और पार्टी दोनों हाशिये पर चली जाएगी.  

Tuesday, 16 June 2015

लेह का बिहार- स्कम्पारी

लेह में बिहारी खाने पीने की दुकान 
लेह की किसी गली से गुजरते हुए आपके कानों में अगर बगल वाली जान मारेलीजैसा भोजपुरी गीत सुनाई पड़े तो कौतूहल होना स्वाभाविक है. ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ अपने लेह प्रवास के दौरान. एक दुकान में चल रहे वार्तालाप ने मुझे अपनी ओर खींच लिया का चीज, का बीस रुपये. अरे अपच हो जाई. ये लेह का स्कम्पारी ईलाका है, जहाँ लेह में एक छोटा बिहार बसता है'. मैं भी उस बातचीत में शामिल हो गया. और फिर जो तथ्य हाथ लगे उससे पता पड़ा कि लेह क्यों बिहारी मजदूरों का स्वर्ग है.
फ्लाईट से उड़कर आते हैं मजदूरी करने
लेह में कुशल मजदूरों की भारी कमी है. जिसकी पूर्ति नेपाली और बिहारी मजदूर करते हैं. पर इसमें बड़ा हिस्सा बिहारी मजदूरों का है. लेह में जहाँ कहीं भी निर्माण चल रहा हो आप वहां आसानी से बिहारी मजदूरों को काम करते देख सकते हैं. जिसमें ज्यादा हिस्सा बेतिया जिले का है. बेतिया से यहाँ मजदूरी करने आए हीरा लाल शाह ने कुछ पैसे जोड़कर एक मिठाई की दुकान खोल ली. जिससे वे उस स्वाद की भरपाई कर सकें, जिसका आनंद वो और उनके जैसे सैकड़ों मजदूर नहीं ले पा रहे थे. उनकी दूकान पर सुबह शाम उन बिहारी मजदूरों का तांता लगा रहता है. लिट्टी बाटी या पकोड़ी के लिए. देवनाथ शाह बताते हैं कि यहाँ आने के लिए वे कई महीने पहले टिकट कटा लेते हैं. इससे दिल्ली से लेह का टिकट ढाई से तीन हजार रुपये में मिल जाता है. और फरवरी मार्च में मजदूर यहाँ आ जाते हैं. दो-चार दिन आराम करने के बाद यहाँ काम मिल ही जाता है. छ महीने पैसा कमाने के बाद दशहरे के आसपास फिर अपने गाँव फ्लाईट से लौट जाते हैं. देवनाथ यह बताना नहीं भूलते कि दिल्ली से अपने गाँव का सफर वो ट्रेन के एसी डिब्बे में ही करते हैं.
स्कम्पारी है छोटा बिहार
चूंकि सभी मजदूर एक दूसरे के रिफरेन्स से लेह पहुँचते हैं इसलिए सब एक ही जगह साथ रहना पसंद करते हैं. उन्हीं में से कुछ लोगों ने अपनी दुकानें वहां खोल ली हैं. चाहे भोजपुरी गाने हों या फ़िल्में मोबाईल में डालनी हों, या सब्जी बेचना, सब जगह बिहार से आए मजदूर हैं. मजेदार बात यह है कि दुकान साल में छह महीने ही खुलती है, ठण्ड के कारण ये सभी सर्दियों में अपने घर लौट जाते हैं, पर दुकान मालिक को साल भर किराया देना होता है. लेकिन ये नुकसान उन्हें मंजूर है, क्योंकि उत्तर प्रदेश या बिहार में जहाँ एक दिन की औसत दिहाड़ी लगभग साढ़े तीन सौ रुपये है वहीं लेह में उतने ही काम के पांच सौ से छह सौ रुपये मिल जाते हैं.
स्थानीय ठेकेदार परवेज अहमद बताते हैं कि बिहारी मजदूर बहुत मेहनती और कुशल होते हैं. प्लास्टर और पुताई के काम में इनका कोई मुकाबला नहीं हैं. लेह के जिलाधिकारी सौगत बिस्वास ने बताया कि इस समय लेह में करीब दस हजार बिहारी मजदूर हैं और अपनी मेहनत से वे लेह के निवासियों का जीवन आसान बना रहे हैं.

Saturday, 6 June 2015

नेस्ले मैगी - सेहत के साथ खिलवाड़

देश में नूडल कारोबार में नेस्ले की ब्रांड मैगी सबसे आगे है. नेस्ले ने 1980 के दशक में  सबसे पहले नूडल की शुरुआत करते हुए मैगी को भारतीय बाज़ार में उतारा था. इसके बाद से यह लगातार आजतक तक इस कारोबार में सबसे आगे है. हालांकि पिछले 10 सालों में भारत में कई विदेशी और घरेलू ब्रांड के नूडल लांच किए गए हैं. लेकिन आज भी मैगी के पास देश के नूडल कारोबार सबसे बड़ा हिस्सा है. एक पीढ़ी है जिसे हम मैगी पीढ़ी कह सकते हैं. इन सब बातों के साथ भारत विश्व में नूडल खपत में चौथा सबसे बड़ा देश भी है. जानिए नूडल कारोबार की कुछ अहम बातें-

Ø देश के नूडल व्यवसाय में मैगी ब्रांड की हिस्सेदारी है 70%.
Ø 4000 करोड़ रुपए का सालाना कारोबार है नूडल्स का देश में.
Ø अकेला नेस्ले का मैगी नूडल ब्रांड 3000 करोड़ का सालाना कारोबार करता है.
Ø नेस्ले इंडिया के कुल कारोबार के 30% हिस्से पर मैगी का कब्जा है.
Ø मैगी के बाद दूसरे नंबर पर आईटीसी का नूडल ब्रांड सनफीस्ट यिप्पी है.
Ø मैगी के अलावा देश में यिप्पी नूडल्स, नॉर, चिंग्स और टॉप रैमेन भी लोकप्रिय ब्रांड हैं.
Ø आईटीसी का यिप्पी ब्रांड नूडल मार्केट के 20% हिस्से के साथ 800 करोड़ का कारोबार करता है.
Ø नूडल मार्केट का तीसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी हिंदुस्तान यूनीलीवर का ब्रांड नॉर है, जिसके पास बाजार का 5% हिस्सा है.
Ø भारत में पिछले पांच साल में नूडल की सेल दोगुना हुई है.
Ø चीन, इंडोनेशिया और जापान नूडल खाने में भारत से आगे.


नेस्ले का मैगी नूडल एशियाई देशों खासकर भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ. फिर सवाल उठता है यूरोप और अमेरिका में क्यों नहीं? दरअसल, नेस्ले ने मैगी को लेकर भारत में जमकर झूठ बोला, जो कि यूरोप और अमेरिका के कड़े एडवरटाइजिंग कानूनों के चलते संभव नहीं था. जानिए, उन तथ्यों को जो भारत में तो जमकर कारगर हो गए, जबकि ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में नहीं.

Ø नेस्ले ने दावा किया था कि मैगी 'मांसपेशी, हड्डी और बालों को मजबूत बनाती है'. लेकिन ब्रिटिश एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी ने तुरंत आपत्ति लेते हुए कहा कि यह दावा यूरोपियन यूनियन के कंज्यूमर प्रोटेक्शन कानून के खिलाफ है. कंपनियों को ऐसा दावा करने से पहले हेल्थ क्लेम का प्रूफ देना होता है.
Ø यह खुलासा तीन साल पहले भी हुआ था कि भारत में बिकने वाले मैगी में स्वाद बढ़ाने वाला MSG (मोनो सोडियम ग्लूकामेट) होता है. यह सोया प्रोटीन में पोरसीन एंजाइम (सुअर की आंतों से निकालकर) मिलाकर बनता है. नेस्ले ने अपने पैक पर लिखा- 'NO MSG ADDED'. अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने इस दावे को गुमराह करने वाला बताया. क्योंकि हाइड्रोलाइज्ड प्रोटीन पकने के बाद MSG में बदल जाता है. यह जानकारी भारत में भी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.
Ø MSG पर इतना हल्ला क्यों? क्योंकि यह सबसे अनावश्यक एमीनो एसिड में से एक है. हमारा शरीर भी यह कैमिकल बनाता है, लेकिन मैगी जैसे खाद्य पदार्थों से मिलने वाले MSG के कारण स्किन रिएक्शन, घबराहट, उल्टी, माइग्रेन, अस्थमा, डिप्रेशन और दौरा पड़ने जैसे विकार सामने आते हैं.

क्या नूडल्स पकाने का कोई सही तरीका भी है?
आमतौर पर हम एक बर्तन में पानी लेते हैं और उसमें नूडल्स और मसाला डालकर पकने के लिए रख देते हैं. 3 या 3.5 मिनट में उबल जाने के बाद हम उसे खाने लगते हैं. 


नहीं, ये नूडल्स पकाने का सही तरीका नहीं है.


इस तरह से हम मसाले में मौजूद कैमिकल को MSG के रूप में बदलने का मौका देते हैं. जो कि खतरनाक है. एक बात और है, जो शायद कम ही लोगों ने गौर की है कि नूडल्स पर वैक्स की परत चढ़ी होती है. नूडल्स खा लेने के बाद हमें उस वैक्स को शरीर से बाहर निकालने में 4 से 5 दिन लग जाते हैं.

मैगी हमारे लिए एक परफेक्ट नाश्ता रहा है. जब चाहा, जहां चाहा बना लिया. हॉस्टल हो या कैंप, कहीं भी. यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चे मैगी बनाते रहे हैं. और ऐसा क्यों न हो... बचपन से ही एड में सुनते आए हैं 'टेस्ट भी, हेल्थ भी'. यह तो अब बताया जा रहा है कि सिर्फ टेस्ट है, हेल्थ तो बिलकुल नहीं है.

बच्चों के लिए तो यह बिलकुल सही नहीं था. खासतौर पर उनके बढ़ते दिमाग के लिए. बच्चों का पेट भी छोटा ही होता है. ऐसे में एक पैकेट मैगी उनके लिए दिनभर के खाने का आधा कोटा पूरा कर देती है. यदि आप बच्चों को नूडल्स खिलाना भी चाहें तो ख्याल रहे, महीने में एक-आध बार. और हां, उसमें ढेर सारी सब्जी मिलाना न भूलें


Friday, 5 June 2015

पनीर में क्या है?

पनीर में क्या है?
जश्न मनाने को लेकर कुछ वैजीटेरियन लोगों की ज़िंदगी बड़ी प्रिडिक्टेबल होती है। मसलन, आपके किसी वैजीटेरियन कलीग को अगर बड़ा इंक्रीमेंट मिला है तो अगले दिन ऑफिस आने पर बिना कंफर्म किए आप उससे पूछ सकते हैं, और कल रेस्टोरेंट में कड़ाही पनीर कैसा था?
90 फीसदी चांस हैं कि वो कहेगा, बढ़िया था और 10 फीसदी उम्मीद है कि वो कहेगा, कल मैंने कड़ाही नहीं, शाही पनीर खाया था। मगर इतना तय है कि उसने खाया पनीर ही होगा।

दरअसल, सालों की प्रेक्टिस के बाद, वैजीटेरियन आदमी को लगने लगता है कि ऑर्डर में अगर एक आइटम पनीर का नहीं लिखवाया, तो उससे संविधान की किसी संवेदनशील धारा का उल्लंघन हो जाएगा और बीच खाने में पुलिस, ‘यू आर अंडरअरेस्टकहकर उसे गिरफ्तार कर लेगी।
दो हवाई फायर कर पुलिस इंस्पेक्टर उसे ज़रा-भी होशियारी नहीं दिखाने की हिदायत देगा। हाथों में ग्लव्स पहने दयाजैसा एजेंट सबूत के तौर पर उसकी थाली अपने कब्ज़े में ले लेगा।
और बैकग्राउंड में बजते खौफनाक म्यूज़िक के बीच, चेहरे पर कब्ज़ी की तकलीफ वाले भाव ला वो इस्पेक्टर से कहेगा, सर, हमारी इंफोर्मेशन बिल्कुल करेक्ट थीइनकी थाली में एक भी आइटम पनीर का नहीं है।
उसी तरह किसी भी शादी में स्नैक्स में लगे 15 आइटम में से हर किसी को दस-दस बार खाने के बाद जब यही आदमी मेन कोर्स पर धावा बोलता है, तो बदहवास हो सबसे पहले पनीर तलाशता है।
ठीक वैसे ही, जैसे उस समय कुछ माएं हाथ छुड़ाकर इधर-उधर भागे अपने 3 साल के बच्चे को तलाश रही होती हैं।
पेट में दर्जनों टिकियों और सैंकड़ों वैज मंचूरियन के दबाव के चलते गोल-गप्पे का पानी नाक से निकलने को होगा, मगर बावजूद इसके ये आदमी अपने प्लेट में तीन कड़छी पनीर डालना नहीं भूलता। भले ही वो एक चम्मच न खा पाए मगर उसे ये अपराधबोध तो नहीं रहेगा कि मैं शादी में आया और पनीर नहीं लिया।
खैर, वैजीटेरियन होने और पनीर की दीवानगी रखने के बावजूद मेरा देश के तमाम चाइनीज़ आइटम बनाने वालों से अनुरोध है कि भगवान के लिए चाउमीन में पनीर डालना बंद कर दो। वैसे भी हमारे चीन से रिश्ते अच्छे नहीं हैं!